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Friday, 25 October 2013

Grah Deep By Acharya Dr. Santoshi ji .




ग्रह दीप ....
जीवन में किसी भी प्रकार की शुभता के निमित्त , तत्काल आचार्य डॉ . संतोषी जी से संपर्क कर के मंगवाएं, और अपने जीवन को खुशियों की ओर ले जायें। आचार्य श्री के द्वारा अनुसंधान किया गया यह दीप कई प्रकार के प्राकृतिक औषधियों से ओत प्रोत है , जो अपने अंदर उपस्थित समस्त शक्तियों को एकदम से आप की तरफ ले जायेगा , जिस से आप की कुंडली में असंतुलित ग्रह स्वतः संतुलन की दिशा में अग्रसर होंगे।
आचार्य डॉ . संतोष उपाध्याय " संतोषी जी ' ज्योतिष के क्षेत्र में सर्वोपरि हो चुके हैं , इन्हें सत्यवादिता और सपष्ट वादिता और रत्नों के विरोधी के रूप में जाना जाता है।

Thursday, 8 August 2013

हरियाली तीज की हरियाली शुभकामनाएं :) :)

हरियाली तीज की शुभकामनाएं .......
क्यूँ मानते हैं हरियाली तीज ? ..... !!!

श्रावण माह के शुक्ल पक्ष में तृतीया तिथि को विवाहित महिलाएं हरियाली तीज के रुप में मनाती हैं। यह समय है जब प्रकृति भी अपने पूरे शबाब में होती है, बरसात का मौसम अपने चरम पर होता है और प्रकृति में सभी ओर हरियाली होती है जो इसकी खूबसूरती को दुगुना कर देती है। इसी कारण से इस त्यौहार को हरियाली तीज कहते हैं।

परंपरा के अनुसार तीज सभी पर्वों के शुरुआत की प्रतीक मानी जाती है। आ गई तीज बिखेर गई बीज, आ गई होली भर गई झोली कहावत के आधार पर तीज पर्व के बाद त्यौहारों का शीघ्र आगमन होता है और यह सिलसिला होली तक चलता है। इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं. विवाहित महिलाएं इसे अपने सुखी और लंबे विवाहित जीवन के लिए करती हैं।

किंवदंती है कि पुरातन समय में देवी पार्वती एक बार अपने पति भगवान शिव से दूर प्रेम विरह की गहरी पीड़ा से व्याकुल थीं। इस तड़प के कारण देवी पार्वती ने इस व्रत को किया था। पार्वती जी इस दिन पति परमेश्वर के प्रेम में इतनी लीन हो गईं कि उन्हें न खाने की सुध रही है और न पीने की। इस तरह वह पूरे 24 घंटे व्रत रहीं और इस व्रत के फल के रूप में उन्हें अपने पति का साथ पुनः प्राप्त हुआ। तब से इस दिन स्त्रियां अपने सुहाग के लिए उपवास रखकर मनोकामनाएं पूरी होने का आशीर्वाद मांगतीं हैं।

श्री राधे - श्री कृष्णा 
आचार्य डॉ . संतोष उपाध्याय " संतोषी जी "

Sunday, 13 January 2013

कुम्भ का करिश्मा .. " Kumbh Ka Karishma " .

अनादि अनन्त काल से भारत में चली आ रही कुम्भ महापर्व की परम्परा एक ओर जहां भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति के विराट एक्यता का परिचायक है वहीं दूसरी ओर यह दर्शन, ज्योतिष, आस्था, भक्ति-भावना, निष्ठा, विश्वास आदि का भी द्योतक है। खगोल विज्ञान, ज्योतिष शास्त्र एवं पौराणिक  आख्यान-सन्दर्भों से जुड़े इस सांस्कृतिक पर्व की अवधारणा जन्म-मृत्यु, लोक-परलोक, अमरत्व  साधना की गुत्थियां सुलझाने के एक प्रयास को भी प्रतिबिम्बित करती है। द्वादश वर्षीय निश्चित अवधि के अंतराल पर आयोजित होने वाले इस महापर्व में देश-विदेश से लाखों की संख्या में आये साधकों, भक्तों तथा साधु-संतों, सिद्ध पुरुषों, विद्वानों, विचारकों, चिन्तकों का जमावड़ा होता है और श्रद्धालु जन-मनीषा श्रद्धा भक्ति भाव से उनके सारगर्भित वाणी का श्रवण कर, उनके चरण स्पर्श एवं दर्शन कर अपने जीवन को सार्थक मानती है।
इस महापर्व की जड़ें  नदी पूजन से जुड़ी हैं और कुछ विद्वानों की मान्यता है कि यह त्योहार-पर्व आर्यों के आगमन के पूर्व से ही प्रचलित है जबकि इसके वास्तविक उद्ïगम काल का निर्धारण करना कठिन है। कुम्भ, जैसा कि नाम से प्रतीत होता है, मातृगर्भ का प्रतीक है, मां जो जगदजननी है, जन्मदात्री है इस तरह यह मां का प्रतिबिम्ब है और नदी उर्वरता का द्योतक। इस तरह यह मानव जन्म से भी संयुक्त लगता है। पौराणिक मान्यतानुसार कुम्भ पर्व का संबंध देवासुर संग्राम से है। अमृत प्राप्ति हेतु जब देव-दनुजों के संयुक्त उपक्रम से सागर मन्थन किया गया जिसमें कच्छप रूपधारी विष्णु सागर की तल में स्थित होकर मथानी रूपी मन्दराचल को अपने पृष्ठभाग पर धारण किया और नाग वासुकी को मथानी की रस्सी के रूप में प्रयुक्त किया गया तब अंत में धन्वन्तरि अमृत कुम्भ के साथ प्रकटे। उस समय इन्द्र पुत्र जयन्त अमृत कुम्भ उनसे वलात ले लिया और भाग चले। दानवों ने उनका पीछा किया। जयन्त के साथ सूर्य, चन्द्र, गुरु भी कुम्भ की रक्षा के लिए चल पड़े। देवताओं ने दानवों को रोकने का प्रयास किया जिससे उनमें संग्राम छिड़ गया जो बारह दिनों तक चलता रहा। जयन्त भी बारह दिनों में कुम्भ ले स्वर्ग पहुंचे पर मार्ग में वह पृथ्वी पर चार स्थानों— प्रयाग, हरिद्वार, उज्जयिनी तथा नासिक में तथा देवलोक में आठ स्थानों पर विश्राम के लिए रुके जहां सूर्य, चंद्र, गुरु कुम्भ की रखवाली करते रहे। पृथ्वी पर चारों स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें छलक पड़ीं और इसीलिए इन चारों स्थानों पर प्रत्येक बारह साल में क्रमानुसार कुम्भ पर्व मनाया जाता है (अन्य शब्दों में हर तीसरे साल एक-एक स्थान पर कुम्भ मनाते हुए उसी स्थान पर दोबारा बारह साल में कुम्भ पर्व मनता है)।
इस महापर्व का प्रत्यक्ष संबंध खगोल विज्ञान की गणनानुसार सौरमंडल स्थित ग्रह-नक्षत्रों आदि की गति से है। जब आकाश में ग्रह, नक्षत्र, राशि एवं तिथि का विशिष्ट योग बनता है तब उस काल को कुम्भ पर्व कहा जाता है। पौराणिक आख्यानानुसार चूंकि कुम्भ की रक्षा में चार खगोलीय सूत्रधार सूर्य, चंद्र, गुरु तथा शनि थे जिन्हें लोक परंपरानुसार ही नहीं खगोलीय गणना में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। उल्लेख है कि सौरमंडल स्थित विशिष्ट ग्रहों के खगोलीय संयोगों के कारण, विशिष्ट राशियों में प्रत्येक बारह वर्ष पश्चात प्रविष्ट होने पर प्रयाग, उज्जयिनी, नासिक तथा हरिद्वार में कुम्भ पर्व का आयोजन होता है। द्वादश वर्षीय अंतराल का कारण यह है कि ज्योतिष शास्त्र में कुल बारह राशियां हैं और उनको विशिष्ट खगोलीय संयोग में आने के लिए बारह वर्ष लगते हैं। उदाहरण के लिये जब सूर्य, चंद्र, मकर राशि में तथा गुरु वृषभ राशि में होते हैं तब प्रयाग में, जब सूर्य, चन्द्र मेष राशि में तथा गुरु कुम्भ राशि में होते हैं तब हरिद्वार में कुम्भ पड़ता है। उज्जैन (उज्जयिनी) में कुम्भ के लिए दश योग का होना आवश्यक है। प्रसंगवश महाकुम्भ या पूर्णकुम्भ केवल प्रयाग में होता है जो प्रत्येक बारह वर्ष में आता है। (हर छठवें वर्ष अद्र्धकुम्भ होता है) और इसमें पडऩे वाली अमावस्या महत्वपूर्ण होती है। यदि अमावस्या सोमवार को पड़े तो उसका विशिष्ट महत्व होता है। (सन् 2001 में प्रयाग में पूर्णकुम्भ पड़ा था  तथा उस साल अमावस्या सोमवार को थी) इन चारों स्थानों को, जहां अमृत बूंद छलका माना जाता है, तीर्थ कहते हैं और प्रयाग को तीर्थराज। विदित हो कि आध्यात्मिक मान्यतानुसार तीर्थ धरती तथा स्वर्ग, मनुष्य देवताओं के बीच सेतु माने जाते हैं।
गंगा तट (हरिद्वार), शिप्रा तट (उज्जैन), गोदावरी तट (नासिक) तथा गंगा-यमुना-सरस्वती संगम तट (प्रयाग) पर आयोजित होने वाले कुम्भ पर्व/महाकुम्भ आध्यात्मिक चेतना की ज्योति प्रभासित करते हैं एवं भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एकता की महत्वपूर्ण भूमिका  का निर्वहन करते हैं। पौराणिक मान्यतानुसार कुम्भ में इन पावन नदियों में स्नान, दान, यज्ञ, हवन, सत्संग, कथा श्रवणादि से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं। इसी दृढ़ आस्था से लाखों की संख्या में लोग कुम्भ में वहां जाते हैं तथा भाषा, साम्प्रदायिक संकीर्णता, जात-पात के भेदभाव से परे हट कर पवित्र नदियों के  जल में डुबकी लगा उनकी जयकार कर विश्वास कर लेते हैं कि उनके सारे पाप धुल गये। वहां आने वालों का एक उद्देश्य वहां आए महान संतों, साधुओं-ऋषियों आदि का दर्शन कर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना भी होता है तथा सबमें मोक्ष की कामना कहीं  अधिक बलवती होती है। अर्थवेद में कहा गया है ”पूर्णकुम्भो अधिकाल अहिरत, वे पश्यामो बहुधा नु सन्त:। स इमा विश्वा-भुवनानि प्रत्यङ्गकाले तमाहु: परमे व्योमन्॥” भावार्थ यह कि पूर्णकुम्भो काल (मृत्यु) के ऊपर स्थित है जबकि काल समस्त लोकों में चलायमान है जिनसे रक्षा वहां संत ही करते हैं, इसलिए भी पूर्णकुम्भ या महाकुम्भ महत्वपूर्ण माना जाता है।
वस्तुत: कुम्भ पर्व भारतीय विचार परंपरा का ऐसा सनातन पर्व है जिसमें अध्यात्म, संस्कृति, धर्म, दर्शन, ज्योतिष, पुराणादि के साथ लोक आस्था, निष्ठा, विश्वास, श्रद्धा, भक्ति भी समाहित हो गया। कुछ के लिये तो यह पर्व ‘जीवन में मात्र एक बार’ है। इसीलिए ऐसे लोग तीर्थराज प्रयाग के महाकुम्भ की यात्रा कर अपना जीवन सार्थक कर मोक्ष की कामना करते हैं

Tuesday, 12 June 2012

Manglik Dosh -


                                      मांगलिक दोष - एक भ्रामक  सत्य "


बेटी  या बेटे के बड़े होते ही , जब उनके विवाह के विचार मन में आने आरंभ होते है , तो सबसे पहले जो बात मन में आती है , वो होती है , कहीं हमारे बच्चे मांगलिक तो नही है ? मांगलिक हैं तो सैकड़ों प्रकार के विचार मन में व्याप्त होने लगते हैं , आखिर क्या होता है ये मांगलिक दोष !! आइये जानते हैं ! शास्त्रों के अनुसार , जब किसी भी जन्मांक ( जन्म कुंडली ) में , मंगल नमक ग्रह , लग्न , चतुर्थ , सप्तम , अस्टम , द्वादश भाव में बैठे तो कुंडली मांगलिक बन जाती है ! अब शास्त्रों के अनुसार ऐसी स्थिति में बच्चे का विवाह ऐसी की कन्या / पुरुष से होना चाहिए जिसके जन्म कुंडली में मंगल इन्ही भावों में बैठा हो ! नहीं तो अनिष्ट की सम्भावना बनी रहती है ! अनिष्ट होगा तो कैसा, यह कोई विद्वान् जल्दी नहीं बताता ! क्या दोनों लड़ेंगे , क्या आर्थिक  संकट आएगा , क्या स्वाश्थ ख़राब रहेगा , या फिर क्या उनमे से कोई एक अल्पायु होगा ! अक्सर जो डर लोगों के मनों में होता है वह यही होता है की दोनों मेसे किसी एक की आयु पे संकट रहेगा , लेकिन ऐसा बिलकुल भी नही है ! हम इसे एकदम एक सिरे से काट रहे है ! 

आइये बताते हैं मंगल के विषय में कुछ बेहद रोचक तथ्य :- 

मंगल एक ऐसा ग्रह है , 
जिसे ग्रहों का सेनापति माना जाता है  ! अर्थात , यह एक रक्षात्मक ग्रह है , इस से हम रक्षा सुरक्षा प्राप्त करते है !, परन्तु यह अग्नि तत्व प्रधान भी है ! क्रोधी ग्रह भी है  ! अगर कोई बच्चा / बच्ची मांगलिक है , तो सिर्फ इसका एक प्रभाव होगा , की वह किसी भी बात को समझे बिना रीएक्ट करेगा ! जिस से दोनों में कम निभेगी ! अकसर विवाद जन्म लेते रहेंगे ! लेकिन इनमे कई एनी योगों का होना भी अनिवार्य होगा ! ध्यान रहे , ज्योतिष  शास्त्र सदैव योगों पे ही जिन्दा रहता है ! जब तक कोई ग्रह किसी अन्य ग्रह के योग अर्थात  जोड़ में साथ में नहीं आता है , तब तक वह ग्रह अपना पूर्ण फल नही दे सकता ! 

अब आइये जानते हैं मांगलिकता की सच्चाई ... जिसकी कुंडली मांगलिक होगी , मंगल पांच भावों में से कहीं पे भी बैठ हो , उसमे कुछ लक्षण जैसे , अचानक से आक्रामक हो जाना , छोटी छोटी बात पे क्रोधित हो जाना , परिवार से दूर रहने की इच्छा जागृत हो जाना , किसी पे भी एकाधिकार पाने का मन बनाना , अपनी बात को सबसे मनवाने की सोचना आदि जैसे नकारात्मक लक्षण सदैव जागते रहेंगे !याद रहे यहाँ पर हम सिर्फ उन बातों को बता रहे जिनका संबध सीधे तौर पे शादी शुदा जीवन से हैं , क्यूँ की मंगल  अन्य भी बहुत चीजों का करक होता है , लेकिन उनका सम्बन्ध वैवाहिक जीवन से नहीं होता !  अब अगर दूसरा बच्चा भी  मांगलिक रहा तो क्या होगा , कल्पना कीजिये ! यही सरे लक्षण उसके अन्दर भी प्रकट होंगे ! ऐसे में टकराव की सम्भावना कई हजार गुना बढ जाएगी ! दोनों एक दुसरे को देखना भी पसंद नही करेंगे ! दोनों एक दुसरे से तलाक चाहेंगे ! अलग रहना पसंद करेंगे ! खास तौर पे महिला ! लेकिन अगर एक मंगली नहीं होगा तो , निश्चित तौर पे वह कुछ जयादा शांत होगा , मांगलिक वाले से ! वह कई बार चुप चाप डांट सह लेगा , मुस्कुराएगा , समय बीतने का इंतज़ार करेगा , और फिर किसी प्रकार से , कुछ भी करके गाडी चलती रहेगी ! 
अब आप खुद निर्णय लीजिये  की क्या मांगलिक की शादी मांगलिक से ही करनी चाहिए ? क्या दोनों आग रहेंगे तो काम चलेगा ? किसी एक तो निर्मल जल बनना ही पड़ेगा , और निर्मल जल " नॉन मंगली " ही बन पायेगा ! उसी के कंधे पे सारा दारोमदार रहेगा ! 
और हाँ अगर कोई , अल्पायु है तो ये उसका प्रारब्ध है , उसके अपने मारक ग्रह है , किसी के मांगलिक होने से किसी की आयु कम हो जाती है ??????? कितना मुर्खता पूर्ण लगता है सुनने में ही , हाँ इतना जरूर है की दोनों से किसी की भी जन्म कुंडली से ये संकेत मिल जायेगा की उसका जीवन साथी कितनी आयु तक उसके साथ रहने वाला है , ध्यान रहे , सिर्फ जानकारी मिल पाती है  , अब इसे कोई कैसे बदल पायेगा , ये तो भाग्य है , यही तो प्रारब्ध है ! 
यह निर्णय हमने अपने कई वर्षों के शोधों के उपरान्त निकला है ! आज बेहद आवश्यकता है की ज्योतिषी बंधू , नए नए अनुसंधान करे , सिर्फ पुस्तकीय बातें , एकदम गलत साबित होंगी ! शोध सदैव सुद्ध और शुभ होगा ! आशा करेंगे की इस लेख का लाभ जनमानस तक अवश्य पहुंचेगा ! 

By - Acharya Dr. Santosh Upadhyay " Santoshi Ji " 

Wednesday, 21 March 2012

नौ रूपों की महिमा अपार सुख-समृद्धि का खोले द्वार


नौ रूपों की महिमा अपार सुख-समृद्धि का खोले द्वार
  • clip
    नवरात्र के नौ दिनों में माता के नौ रूपों की पूजा करने का विशेष विधि विधान है। साथ ही इन दिनों में जप-पाठ, व्रत-अनुष्ठान, यज्ञ-दानादि शुभ कार्य करने से व्यक्ति को पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। इस वर्ष में पहला नवरात्र शुक्रवार के दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में प्रारंभ होगा, तथा ये नवरात्र 1 अप्रैल 2012 तक रहेंगे।

  • 23 मार्च 2012 के दिन से नव संवत्सर प्रारंभ होगा। साथ ही इस दिन से चैत्र शुक्ल पक्ष का पहला नवरात्रा होने के कारण इस दिन कलश स्थापना भी की जाएगी। नवरात्र के नौ दिनों में माता के नौ रूपों की पूजा करने का विशेष विधि-विधान है। साथ ही इन दिनों में जप-पाठ, व्रत-अनुष्ठान, यज्ञ-दानादि शुभ कार्य करने से व्यक्ति को पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। इस वर्ष में पहला नवरात्र शुक्रवार के दिन उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में प्रारंभ होगा, तथा ये नवरात्र 1 अप्रैल 2012 तक रहेगें।
    सर्वप्रथम श्री गणेश का पूजन: प्रतिपदा तिथि के दिन नवरात्र पूजा शुरू करने से पहले कलश स्थापना जिसे घट स्थापना के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में देवी पूजन का विशेष महात्मय है। इसमें नौ दिनों तक व्रत-उपवास कर, नवें दिन दस वर्ष की कन्याओं का पूजन और उन्हें भोजन कराया जाता है।
    शुभ मुहूर्त में घट स्थापना: सभी धार्मिक तीर्थ स्थलों में इस दिन प्रात: सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त समय में घट स्थापना की जाती है। नवरात्र के पहले दिन माता दुर्गा, श्री गणेश देव की पूजा की जाती है। इस दिन मिट्टी के बर्तन में रेत-मिट्टी डालकर जौ-गेहूं आदि बीज डालकर बोने के लिए रखे जाते है।
    भक्त जन इस दिन व्रत-उपवास और यज्ञ आदि का संकल्प लेकर माता की पूजा प्रारंभ करते हैं। नवरात्र के पहले दिन माता के शैलपुत्री रूप की पूजा की जाती है। जैसा की सर्वविदित है, माता शैलपुत्री, हिमालय राज जी पुत्री है, जिन्हें देवी पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रों में माता को प्रसन्न करने के लिए उपवास रखे जाते है। रात्रि में माता दुर्गा के नाम का पाठ किया जाता है। इन नौ दिनों में रात्रि में जागरण करने से भी विशेष शुभ फल प्राप्त होते है।
    माता के नौ रुप: नवरात्रों में माता के नौ रूपों कि पूजा की जाती है। नौ देवियों के नाम इस प्रकार है। प्रथम-शैलपुत्री, दूसरी-ब्रह्मचारिणी, तीसरी-चंद्रघंटा, चौथी-कुष्मांडा, पांचवी-स्कंधमाता, छठी-कात्यायिनी, सातवीं-कालरात्री, आठवीं-महागौरी, नवमीं-सिद्धिदात्री।
    चैत्र पक्ष पहला नवरात्रा - घट स्थापना विधि 
    शारदीय नवरात्रा का प्रारंभ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापन के साथ होता है। कलश को हिंदु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश का स्वरूप माना जाता है। अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है। कलश स्थापन के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है। भूमि की शुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगाजल से भूमि को लिपा जाता है। विधान के अनुसार इस स्थान पर सात प्रकार की मिट्टी को मिलाकर एक पीठ तैयार किया जाता है, अगर सात स्थान की मिट्टी नहीं उपलब्ध हो तो नदी से लाई गई मिट्टी में गंगोट यानी गांगा नदी की मिट्टी मिलाकर इस पर कलश स्थापित किया जा सकता है।
    पहले दिन माता शैलपुत्री पूजन, पहले दिन किस देवी कि पूजा करे? 
    कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेंट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है। इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है।
    जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नमोस्तुते। इसी मंत्र जाप से साधक के परिवार को सुख, संपत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद प्राप्त होता है।
    कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना
    कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दाईं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बाईं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है। चूंकि भगवान शंकर की पूजा के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है। अत: भगवान भोले नाथ की भी पूजा भी की जाती है। प्रथम पूजा के दिन ‘शैलपुत्री’ के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती है। इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है। प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती होती है। आरती में ‘जग जननी जय जय’ और ‘जय अंबे गौरी’ के गीत भक्त जन गाते हैं।
    नवरात्रों में किस दिन करें किस ग्रह की शांति
    नवरात्र में नवग्रह शांति की विधि:-
    n यह है कि प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति करानी चाहिए।
    n द्वितीय के दिन राहु ग्रह की शांति करने संबंधी कार्य करने चाहिए।
    n तृतीया के दिन बृहस्पति ग्रह की शांति कार्य करना चाहिए।
    n चतुर्थी के दिन व्यक्ति शनि शांति के उपाय कर स्वयं को शनि के अशुभ प्रभाव से बचा सकता है।
    n पंचमी के दिन बुध ग्रह,
    n षष्ठी के दिन केतु
    n सप्तमी के दिन शुक्र
    n अष्टमी के दिन सूर्य
    n नवमी के दिन चंद्रमा की शांति कार्य किए जाते है।
    किसी भी ग्रह शांति की प्रक्रिया शुरू करने से पहले कलश स्थापना और दुर्गा मां की पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद लाल वस्त्र पर नव ग्रह यंत्र बनावाया जाता है। इसके बाद नवग्रह बीज मंत्र से इसकी पूजा करें फिर नवग्रह शांति का संकल्प करें।
    प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति होती है, इसलिए मंगल ग्रह की फिर से पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद पंचमुखी रूद्राक्ष, मूंगा या लाल अकीक की माला से 108 मंगल बीज मंत्र का जप करना चाहिए। जप के बाद मंगल कवच एवं अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करना चाहिए। राहू की शांति के लिए द्वितीया को राहु की पूजा के बाद राहू के बीज मंत्र का 108 बार जप करना, राहू के शुभ फलों में वृ्द्धि
    करता है।
    नवरात्रों में देवी के संग किस देव की पूजा करें।
    नवरात्र में मां दुर्गा के साथ-साथ भगवान श्रीराम व हनुमान की आराधना भी फलदायी बताई गई है। सुंदरकाण्ड, रामचरित मानस और अखण्ड रामायण से साधक को लाभ होता है। शत्रु बाधा दूर होती है। मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। नवरात्र में विघि विधान से मां का पूजन करने से कार्य सिद्ध होते हैं और चित्त को शांति मिलती है।
     

Tuesday, 6 March 2012

होली पूजन , मुहूर्त यवं विधि ( 2012 ) :-


होली हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। 
यह त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। 
होली की शाम को होलिका का पूजन किया जाता है। 
होलिका का पूजन विधि-विधान से करने से अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है। 
होली की पूजन विधि इस प्रकार है-

पूजन सामग्री

रोली, कच्चा सूत, चावल, फूल, साबूत हल्दी, मूंग, बताशे, नारियल, बड़कुले (भरभोलिए) आदि।

पूजा विधि

एक थाली में सारी पूज सामग्री लें ! 
साथ में एक पानी का लौटा भी लें। 
इसके पश्चात होली पूजन के स्थान पर पहुंचकर नीचे लिखे मंत्र का उच्चारण करते हुए स्वयं पर और पूजन सामग्री पर थोड़ा जल छिड़कें-

ऊँ पुण्डरीकाक्ष: पुनातु,
ऊँ पुण्डरीकाक्ष: पुनातु,
ऊँ पुण्डरीकाक्ष: पुनातु।

अब हाथ में पानी, चावल, फूल एवं कुछ दक्षिणा लेकर नीचे लिखें मंत्र का उच्चारण करें-

ऊँ विष्णु: विष्णु: विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया अद्य दिवसे क्रोधी नाम संवत्सरे संवत् 2068 फाल्गुन मासे शुभे शुक्लपक्षे पूर्णिमायां शुभ तिथि बुधवासरे ----------गौत्र(अपने गौत्र का नाम लें) उत्पन्ना----------(अपने नाम का उच्चारण करें) मम इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सर्वपापक्षयपूर्वक दीर्घायुविपुलधनधान्यं शत्रुपराजय मम् दैहिक दैविक भौतिक त्रिविध ताप निवृत्यर्थं सदभीष्टसिद्धयर्थे प्रह्लादनृसिंहहोली इत्यादीनां पूजनमहं करिष्यामि।



गणेश-अंबिका पूजन

सर्वप्रथम हाथ में फूल व चावल लेकर भगवान गणेश का ध्यान करें-

गजाननं भूतगणादिसेवितं 

कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।

उमासुतं शोकविनाशकारकं 

नमामि विघ्नेश्वरपादपमजम्।।

ऊँ गं गणपतये नम: पंचोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।।
  • अब भगवान गणपति को एक पुष्प पर रोली एवं अक्षत लगाकर समर्पित कर दें।

ऊँ अम्बिकायै नम: पंचोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पाणि सर्मपयामि।।

  • मां अंबिका का ध्यान करते हुए पंचोपचार पूजा के लिए गंध, चावल एवं फूल चढ़ाएं।

ऊँ नृसिंहाय नम: पंचोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।।

  • भगवान नृसिंह का ध्यान करते हुए पंचोपचार पूजा के लिए गंध, चावल व फूल चढ़ाएं।

ऊँ प्रह्लादाय नम: पंचोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।।

  • प्रह्लाद का स्मरण करते हुए नमस्कार करें और पंचोपचार हेतु गंध, चावल व फूल चढ़ाएं।

अब नीचे लिखे मंत्र का उच्चारण करते हुए होली के सामने दोनो हाथ जोड़कर खड़े हो जाएं तथा अपनी मनोकामनाएं की पूर्ति के लिए निवेदन करें-

असृक्पाभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै: अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव:।।

अब गंध, चावल, फूल, साबूत मूंग, साबूत हल्दी, नारियल एवं बड़कुले(भरभोलिए) होली के डांडे के समीप छोड़ें।
कच्चा सूत उस पर बांधें और फिर हाथ जोड़ते हुए होली की तीन, पांच या सात परिक्रमा करें। 
परिक्रमा के बाद लोटे में भरा पानी वहीं चढ़ा दें।


शुभ मुहूर्त :- 

  • 7 मार्च, 2012 को शाम 05:55 बजे से  8 मार्च को प्रात: 03:11 बजे तक पूर्णिमा रहेगी। 
  • होलिका दहन पूर्णिमा में किया जाता है। 
  • लेकिन भद्रा तिथि के शुरुआती 2 घंटों मे पूजन शुभ नहीं माना जाता इसलिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-


- शाम 8 से 9:30 तक शुभ !

- रात 9:30 बजे से रात 11 बजे तक अमृत योग में !

- रात 11 बजे से 12:30 तक चर

- 09:09  से 11:24 तक (वृश्चिक लग्न में) 

...................................................... द्वारा :- आचार्य डॉ. संतोष " संतोषी " 
 

Sunday, 19 February 2012

Jay Shiv Shambhu !! Har Har Mahadev


हर हर महादेव :-----
जय भोले शंकर :------


20 फरवरी को महाशिवरात्रि 65 वर्ष पश्चात पंचांग व ग्रहों के दुर्लभ संयोग के साथ आ रही है। इस दिन वार, तिथि, नक्षत्र, योग, करण एवं ग्रहों पर शिव का प्रभुत्व रहेगा। ऐसा संयोग 'शिव संयोग' कहलाता है। शिव महापुराण के अनुसार जब-जब ग्रहों के परिभ्रमण में पंचांग एवं ग्रहों का संयोग राशि तथा नक्षत्र के आधार पर एक जैसा बनता है, तो इसे शिव संयोग कहते हैं। इस शिवरात्रि पर ऐसा ही विशिष्ट संयोग बन रहा है, जो धर्म, ध्यान व अनुष्ठान के लिए विशेष पुण्य फलदायी है।  इस दिन क्रमशः भगवान गणेश, लक्ष्मी, कुबेर, चंद्रमा तथा प्रधान देव शिव का पूजन करें। अभीष्ट की प्राप्ति के लिए मध्यरात्रि में साधना व सिद्घि फलदायी रहेगी

ऐसे बना संयोग :  स्थानीय रेखांश व समय की गणना के आधार पर 20 फरवरी को दिन सोमवार, तिथि चतुर्दशी, श्रवण नक्षत्र, बारयान योग तथा सिद्घि योग है। नवग्रहों के अंतर्गत चंद्रमा मकर, सूर्य तथा बुध कुंभ एवं शनि तुला राशि में परिभ्रमण कर रहे हैं। पंचांग व ग्रहों की यह स्थिति 21 फरवरी 1955 को बनी थी।
क्या है विशेष :  सोमवार के दिन के स्वामी शिव है, चतुर्दशी के स्वामी भी शिव है, सिद्घि योगाः के साथ शनि का तुला राशि में परिभ्रमण, श्रवण नक्षत्र की उपस्थिति, वरियान योग का मध्यरात्रि काल शिवरात्रि पर विशेष महत्व रखता है। इसमें मंत्र दीक्षा, इष्ट मंत्र सिद्धि, श्री यंत्र सिद्धि, रुद्र यंत्र सिद्धि, बगलामुखी यंत्र सिद्धि आदि मध्यरात्रि में की जाती है।

शिव कृपा का महा पर्व शिवरात्रि 
पुराणों में भोलेनाथ के रोचक प्रसंग
सबसे प्रथम ब्रह्मा तथा विष्णु ने भगवान शंकर के लिंग की तथा मूर्ति की पूजा की थी। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा - प्यारे ब्रह्मा तथा प्रिय विष्णु! आज का दिन महान है। आज तुमने ज्योतिर्लिंग के माध्यम से मेरे ब्रह्मस्वरूप का पूजन किया है, उसके बाद मूर्ति रूप में प्रकट मेरे चिन्मय स्वरूप का अर्चन किया है। इससे मैं प्रसन्न हुआ हूँ। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम दोनों अपने-अपने कार्यों में सफल हो जाओ। आज की यह तिथि जगत में 'महाशिवरात्रि' के नाम से प्रसिद्ध होगी।  इस तिथि में जो मेरे लिंग अथवा मूर्ति की पूजा करेगा, वह पुरुष जगत की उत्पत्ति-पालन आदि कार्य भी कर सकेगा। जो पुरुष अथवा स्त्री शिवरात्रि काल में अपनी शक्ति के अनुसार निश्चल भाव से मेरी पूजा करेगा, उसे एक वर्ष तक पूजा करने का फल तुरंत ही मिल जाएगा। मेरा विशाल ज्योतिर्लिंग पृथ्वी पर अत्यंत छोटा होकर रहेगा जिससे सब देव-मनुष्य और आध्यात्मिक साधन परायण भक्त पूजन कर सकेंगे। यह भूतल भी 'लिंग स्थान' के नाम से प्रसिद्ध होगा।  अग्नि के पहाड़ के समान यह मेरा लिंग जहाँ प्रकट हुआ है, वह स्थान अरुणाचल के नाम से प्रसिद्ध होगा। भगवान शिव के दो स्वरूप हैं। एक निष्कल और दूसरा सकल। निष्कल रूप का अर्थ है निर्गुण-निराकार शुद्ध चेतन ब्रह्मभाव जो लिंग रूप है तथा सकल का अर्थ सगुण साकार विशिष्ट चेतन महेश्वर रूप जो मूर्तिमय है। जैसे वाच्य और वाचक में भेद नहीं होता, वैसे ही लिंग और लिंगी में भेद नहीं है। शिव पूजन में शिवलिंग तथा शिव मूर्ति दोनों का पूजन श्रेष्ठ माना गया है तो भी मूर्ति की अपेक्षा शिवलिंग पूजन का विशेष महत्व है। कारण लिंग अमूर्त ब्रह्म चेतन का प्रतीक है तथा समष्टि स्वरूप है जो अव्यक्त चैतन्यसत्ता तथा आनंदस्वरूप है तथा मूर्ति व्यक्त-व्यष्टि एवं सावयव शक्ति है। इसलिए शिवलिंग की प्रतिष्ठा और प्रणव से होती है। मूर्ति की प्रतिष्ठा एवं पूजा 'नमः शिवाय' पंचाक्षर मंत्र से करने का विधान है। 
प्रणव के दो स्वरूप : एक सूक्ष्म प्रणव और दूसरा स्थूल प्रणव। अक्षर रूप में 'ओम्‌' सूक्ष्म प्रणव है और पाँच अक्षर वाला 'नमः शिवाय' मंत्र स्थूल प्रणव है। सूक्ष्म प्रणव के भी हृस्व-दीर्घ ये दो भेद हैं। प्रणव में तीन वर्ण हैं उनमें 'प्र' का अर्थ है प्रकृति से उत्पन्न महाजाल संसार रूप महासागर और 'नव' का अर्थ है इस संसार रूपी महासागर से तरने के लिए नूतन 'नाव'। इसीलिए ओंकार को प्रणव कहा है। प्रणव का दूसरा अर्थ है - 'प्र' प्रपंच 'न' नहीं है 'व' आपके लिए। इस प्रकार जप करने वाले साधकों को ज्ञान देकर मोक्षपद में ले जाता है। इससे विवेकी पुरुष ओंकार को प्रणव कहते हैं। दूसरा भाव यह है कि यह आप सब उपासक योगियों को बलपूर्वक मोक्ष में पहुँचा देगा। इसलिए भी ऋषि-मुनि इसे प्रणव कहते हैं अथवा जप करने वाले उपासक-साधकों को उनके पाप का नाश करके दिव्य ज्ञान देता है इसलिए प्रणव है। माया रहित भगवान महेश्वर को ही 'नव' यानी 'नूतन' कहा है, वह शिव परमात्मा नव-शुद्ध स्वरूप है। प्रणव साधक को नव-शिवरूप बना देता है, इसलिए ज्ञानी जन इसे प्रणव नाम से पुकारते हैं। महाशिव रात्रि को दिन-रात पूजा का विधान है। चार पहर दिन में शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक कर बेलपत्र चढ़ाने से शिव की अनंत कृपा प्राप्त होती है। साथ ही चार पहर रात्रि में वेदमंत्र संहिता, रुद्राष्टा ध्यायी पाठ तपस्वी ब्राह्मणों के मुख से सुनना चाहिए। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पूर्व उत्तरांग पूजन कर आरती की तैयारी कर लेनी चाहिए। सूर्योदय के समय पुष्पांजलि एवं स्तुति कीर्तन के साथ महाशिव रात्रि का पूजन संपन्न होता है। उसके बाद दिन में ब्रह्मभोज भंडारा के द्वारा प्रसाद वितरण कर व्रत संपन्न होता हैं। शास्त्रों के अनुसार शिव को देवाधिदेव महादेव इसलिए कहा गया है कि वे देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, किन्नर, गंधर्व पशु-पक्षी एवं समस्त वनस्पति जगत के भी स्वामी हैं। शिव का एक अर्थ कल्याणकारी भी है। शिव की आराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होने लगता है। स्तुति गान कहता है... मैं आपकी अनंत शक्ति को भला क्या समझ सकता हूँ। अतः हे शिव, आप जिस रूप में भी हों उसी रूप को मेरा प्रणाम। 
यादृशोऽसि महादेव, ता दृशाय नमोनमः।।
महाशिवरात्रि पर्व पूजन विधि
ज्योतिषीय दृष्टि से चतुदर्शी (1+4) अपने आप में बड़ी ही महत्वपूर्ण तिथि है। इस तिथि के देवता भगवान शिव हैं। जिसका योग 5 हुआ अर्थात्‌ पूर्णा तिथि बनती है, साथ ही कालपुरुष की कुण्डली में पांचवां भाव भक्ति का माना गया है। इस व्रत में रात्रि जागरण व पूजन का बड़ा ही महत्व है। इसके पश्चात्‌ सुगंधित पुष्प, गंध, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप-दीप, भांग, नैवेद्य आदि द्वारा रात्रि के चारों पहर में पूजा करनी चाहिए। श्रद्धा व विश्वासपूर्वक किसी शिवालय में या फिर अपने ही घर में उपरोक्त सामग्री द्वारा पार्थिव पूजन करना चाहिए। यह पूजन प्रत्येक पहर में करने का महत्व है। पूजन के समय 'ऊँ नमः शिवाय' मंत्र का जप करना चाहिए। 
हे देवों के देव!हे महादेव!हे नीलकण्ठ!हे विश्वनाथ!हे आदिदेव!हे उमानाथ!हे काशीपति! आप हमारे हर विघ्नों का नाश करें!!! इस व्रत में त्रयोदशी-चतुर्दशी तिथि साथ मानी जाती है। पुराणों के अनुसार भगवान शिव इस ब्रह्मांड के संहारक व तमोगुण से युक्त हैं। जो महाप्रलय की बेला में तांडव नृत्य करते हुए अपने तीसरे नेत्र से ब्रह्मांड को भस्म कर देते हैं। जो कालों के भी काल यानी महाकाल हैं। जहां सभी काल (समय) या मृत्यु ठहर जाते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड की गति वहीं स्थित या समाप्त हो जाती है। रात्रि की प्रकृति भी तमोगुणी है, इसीलिए इस पर्व को रात्रि-काल में मनाया जाता है। इसी प्रकार मास शिवरात्रि का व्रत भी है जो चैत्रादि सभी महीनों की कृष्ण चतुर्दशी को किया जाता है। इस व्रत में रात्रि तक रहने वाली चतुर्दशी तिथि का बड़ा ही महत्व है। अतः त्रयोदशी व चतुदर्शी का विलक्षण संयोग बहुत शुभ व फलदायी माना जाता है। यदि आप मासिक शिवरात्रि व्रत रखना चाह रहें हैं तो इसका शुभारंभ दीपावली या मार्गशीर्ष मास से करें तो शुभ रहता है।